शिक्षा और छात्र

सरायकेला का शिक्षा तंत्र या सिफारिश तंत्र? जहाँ किताबों से ज़्यदा कनेक्शन का पाठ

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सरायकेला का शिक्षा तंत्र या सिफारिश तंत्र? जहाँ किताबों से ज़्यदा कनेक्शन का पाठ

सरायकेला का प्रखंड शिक्षा कार्यालय इन दिनों किसी पाठशाला से कम और “विशेष कृपा केंद्र” से ज्यादा नजर आ रहा है, जहां ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाई नहीं, बल्कि “पकड़” और “पहचान” के नए-नए सूत्र लिखे जा रहे हैं।

सरायकेला का प्रखंड शिक्षा कार्यालय इन दिनों किसी पाठशाला से कम और “विशेष कृपा केंद्र” से ज्यादा नजर आ रहा है, जहां ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाई नहीं, बल्कि “पकड़” और “पहचान” के नए-नए सूत्र लिखे जा रहे हैं। किताबों की जगह यहां रिश्तों की भाषा समझी जाती है और नियमों की जगह प्रभाव का पाठ पढ़ाया जाता है। हालात ऐसे हैं कि शिक्षक कामिनी कांत मेहता और विमल डोगरा अपने स्कूलों से ज्यादा कार्यालय की कुर्सियों पर सक्रिय दिखाई देते हैं, मानो शिक्षा नहीं बल्कि पूरा तंत्र उनके इशारों पर चल रहा हो। उधर स्कूलों में बच्चे शायद “स्वाध्याय” के नाम पर किस्मत के भरोसे बैठने को मजबूर हैं। फाइलें यहां कम चलती हैं, फरमान ज्यादा, और शिकायतें चाय-नाश्ते की मेज पर ही दम तोड़ देती हैं। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि बिना “ऊपर की कृपा” के इतना असर मुमकिन नहीं। कर्मचारी भी इस खामोश व्यवस्था में बंधे हुए हैं—जहां बोलने से ज्यादा चुप रहना सिखाया जाता है। नतीजा यह कि शिक्षा पीछे छूट रही है और व्यंग्य आगे बढ़ रहा है। अब सवाल वही है—क्या कभी इस कहानी का सच सामने आएगा, या फिर यह भी बाकी फाइलों की तरह धूल खाता रह जाएगा? फिलहाल, सरायकेला में बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से ज्यादा “व्यवस्था का व्यंग” पढ़ने को मिल रहा है।